यादों की बूँदें
गुलिस्ताँ बंजर हो गया, उस फूल के मुरझा जाने से,
सूना सब घर-आँगन हो गया, अब तेरे चले जाने से।
देहरी-मोखा सब सूना है, अब वो कोयल गाती गीत नहीं,
सावन में बारिश रोती है, भँवरे का अब कोई मीत नहीं।
यादों की बूँदें गिरती हैं, अंतर-मन के सूने आँचल पर,
बुझ गया दीप उम्मीदों का, रह गए शेष बस बीते पल।
जब तेरे नूपुर बजते थे, सब मौसम खेलते-हँसते थे,
ऋतुओं के चंचल मन पर भी अब मायूसी के बादल छाए हैं।
सुंदर हो बाग या भोर सलोनी, मुझको अब कुछ न भाता है,
मन पर शिला का बोझ-सा है, विरह अब बहुत सताता है।
एक ठेस जिया पे लगती है, जब यादों का झोंका आता है,
बस व्यथा यही है इस दिल की, आँसू न रोका जाता है।
अब आना जब तुम इस चौखट पे, ख़ुशी के मोती लेते आना,
इंतज़ार में बीतेगा हर पल, जैसे बीत रहा हो कोई ज़माना।
तुम आओगे जब इस बगिया में, चमन फिर चहकेगा,
गाएगी कोयल गीत वही, वो फूल फिर से महकेगा।
- Anikant Raaz Mandal
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